मुस्लिम राजनीति और परिसीमन (Delimitation) का खेल

परिसीमन के मुद्दे की बात करें तो हमें देखने को मिलता है कि अधिकतर लोगों को इसके बारे में मालूम ही नहीं है। आम जनता तो इस शब्द को पहली बार सुनती है। परिसीमन (Delimitation) के बारें में कहा जाता कि पढ़े लिखों के बीच का मुद्दा है इसको आम लोग समझ ही नहीं सकते हैं मगर पिछले कुछ समय से मुस्लिम (Muslim) राजनीतिक भागीदारी और परिसीमन के बारे में व्यापक तौर पर बातचीत शुरू हो चुकी है। 

परिसीमन के तहत आरक्षित सीटों (Reserve Seats) के गणित को अगर आसान शब्दों में समझना हो तो आप ऐसे समझ सकते हैं कि संवैधानिक तौर पर दलित और आदिवासी समुदाय को मुख्य धारा में वापस लाने के लिए और उनकी राजनीतिक भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए कुछ लोकसभा (Lok sabha) और विधानसभा (Vidhan sabha) सीटों पर उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण दिया जाता है। जिसमें केवल दलित और आदिवासी समुदाय के लोग ही चुनाव लड़ सकते हैं। 

  • कुल लोकसभा सीटें: 543
  • दलित आरक्षित सीटें: 84
  • आदिवासी आरक्षित सीटें: 47
  • उत्तर प्रदेश विधान सभा की कुल सीटें: 403
  • दलित आरक्षित सीटें: 84
  • आदिवासी आरक्षित सीटें: 02
  • बिहार विधान सभा की कुल सीटें: 243
  • दलित आरक्षित सीटें: 38 
  • आदिवासी आरक्षित सीटें: 02

मुस्लिम राजनीती कैसे प्रभावित होती है? 

आप लोग भी सोचते होंगे कि इसमें मुसलमान एंगल कहां से आ गया है या फिर दलित आदिवासी आरक्षित सीटों से मुस्लिम राजनीती कैसे प्रभावित होती है? इस मुद्दे में मुसलमान एंगल किस तरीके से आया है। तो इसको समझने के लिए आप आरक्षण की बुनियाद को देखेंगे तो बहुत अच्छे से समझ में आएगा कि आरक्षण (Reservation) में सिर्फ तीन धर्म के लोग ही शामिल हैं हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म। इसके अलावा दलित आरक्षण में से मुसलमान और ईसाइयों को धर्म की बुनियाद पर बाहर निकाल दिया। 

अब होता असल खेल शुरू, क्योंकि मुसलमान दलित आरक्षण में शामिल नहीं है इसलिए जो भी सीट दलित आरक्षित होती है वहां पर मुसलमान का चुनाव जीतना तो दूर चुनाव लड़ने पर भी पाबंदी लग जाती है। मुसलमान उस सीट के चुनावी गुणा गणित से एकदम बाहर हो जाता है। कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब उन सीटों पर मुस्लिम आबादी की कैलकुलेशन दलित आबादी से ज्यादा होती है या सीधा कह लीजिए कि देश में इस वक्त बहुत सारी ऐसी लोकसभा और विधानसभा की सीटें हैं जहां पर मुस्लिम आबादी बहुत ज्यादा है और दलित आबादी बहुत कम इसके बावजूद वह सीटें आरक्षित है। 

  • कुछ ऐसा ही मामला आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित सीटों पर है। वहां पर भी बहुत सारी सीटें ऐसी हैं जहां पर मुस्लिम आबादी ज्यादा है और आदिवासी आबादी कम है मगर उन सीटों को परिसीमन के नाम पर ST आरक्षित दिया गया है। 

अब यहां पर एक मामला और आता है कि अगर आपको दलित या आदिवासी समुदाय के लिए सीट को रिजर्व ही करना है तो उन सीटों को करिए जहां पर दलित या आदिवासी आबादी बहुमत में है या ज्यादा गिनती में है और ऐसी सीटें बहुत सारी मौजूद भी हैं जहां पर दलित आबादी या आदिवासी आबादी बहुमत में होने के बावजूद भी उस सीट को जनरल कैटेगरी में रखा गया है। 

तो ऐसे मामला देखने के बाद मुस्लिम समुदाय के दिल में यह बात साफ स्पष्ट हो जाती है कि ऐसा उनके साथ जान बूझ कर किया जाता है। राजनीतिक तौर पर पहले से ही हाशिये पर मौजूद मुस्लिम समुदाय मुस्लिम बहुल सीटों के दलित या आदिवासी आरक्षित होने पर चुनाव लड़ने से अपनी महरूमी और अपने साथ राजनीतिक अन्याय की भावना को महसूस करता है। 

इस रिपोर्ट में परिसीमन के नाम पर मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी के खिलाफ हो रही साजिश को समझने की कोशिश करेंगे। 

आखिरी बार कांग्रेस के शासन काल में लोकसभा सीटों का परिसीमन हुआ था जिसमें बहुत सारी मुस्लिम बहुल सीटों को दलित आरक्षित कर के मुस्लिम राजनीती को वहां से लगभग समाप्त कर दिया गया है। ये ऐसी सीटें थी जहां पर ऐसे चुनावी समीकरण थे जो किसी भी मुस्लिम व्यक्ति के चुनाव जीतने के लिए काफी थे और राजनीतिक तौर पर हाशिये पर धकेले गए मुस्लिम समुदाय को इन सीटों से आसानी से मुस्लिम सांसद मिल सकते थे। 

देश में बहुत सारी सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है और दलित आबादी कम है इसके बावजूद उसे आरक्षित कर दिया गया है। इसके उल्ट कई सीटें ऐसी है जहां दलित आबादी बहुत ज्यादा है इसके बावजूद उन सीटों को जनरल कैटोगरी में रखा गया है। दलित आरक्षित सीट होने का मुस्लिम समुदाय को सबसे बड़ा नुकसान ये है कि वहां मुसलमानों द्वारा चुनाव जीतना तो दूर चुनाव लड़ने पर भी पाबंदी लग जाती है। 

सीटों के उदाहरण से इस पूरे मामले को समझने की कोशिश करते हैं। 

1. मुस्लिम बहुल दलित आरक्षित सीट का दलित बहुल जनरल सीट के साथ तुलना 

रायबरेली

पहली सीट है रायबरेली, जिसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की परंपरागत सीट माना जाता है। इसके जातीय समीकरण को देखेंगे तो इस सीट पर 30 फीसदी से ज्यादा दलित मतदाता हैं। यहां पर 12 फीसदी मुस्लिम मतदाता भी हैं। दलित बहुल सीट होने के बावजूद इसको परिसीमन के नाम पर आरक्षित न कर के जनरल सीट ही रखा गया है। 

बहराइच 

दूसरी तरफ जिस बहराइच लोकसभा सीट से 6 बार मुस्लिम सांसद रहा हो और जिले की 35 फीसदी की आबादी मुस्लिम हो उसे 2009 परिसीमन में दलित आरक्षित सीट घोषित कर दिया गया। जिसके बाद से यहाँ से मुस्लिम राजनीती (सांसदी के तौर पर) का लगभग खात्मा हो चुका है। इस सीट पर केवल 15.6 फीसदी दलित आबादी है फिर भी इस सीट को परिसीमन में आरक्षित किया गया है।

अमेठी

तीसरी सीट अमेठी लोकसभा सीट है जिसको गांधी परिवार की परंपरागत सीट माना जा सकता है। इस सीट से संजय गांधी एक बार, राजीव गांधी चार बार, सोनिया गांधी एक बार और राहुल गांधी तीन बार सांसद रह चुके हैं। इस सीट के जातीय समीकरण को समझिये कि यहां दलित वोटर्स की गिनती 27 फीसदी हैं। इसके साथ ही यहाँ मुस्लिम आबादी भी 19 फीसदी है। 

नगीना 

इसके उल्ट बिजनौर जिले की लोकसभा सीट नगीना जो दलित आरक्षित है इसके बावजूद कि इस लोकसभा के 46 फीसदी वोटर्स मुस्लिम समुदाय से है। यहाँ कि दलित आबादी केवल 21 फीसदी है। जिस मुस्लिम बहुल लोकसभा सीट से मुस्लिम आसानी से सांसद बन सकते थे उस को परिसीमन के नाम पर दलित आरक्षित सीट में तब्दील कर के यहाँ की मुस्लिम राजनीती को खत्म कर दिया गया है। 

अब आप खुद बताये ये कैसा परिसीमन है जिसमें 27% दलित आबादी वाली लोकसभा सीट तो जनरल कैटोगरी में है मगर एक मुस्लिम बहुल सीट जहां केवल 21 फीसदी दलित है उसे आरक्षित कर दिया जाता है। एक सीट जहां दलित 30 फीसदी से भी ज्यादा है उसे जनरल छोड़ कर 15.6 फीसदी दलित आबादी वाली सीट को आरक्षित कर दिया जाता है। 

2. मुस्लिम बहुल आदिवासी आरक्षित सीट का आदिवासी बहुल जनरल सीट के साथ तुलना 

राजमहल

झारखंड की एक लोकसभा सीट है राजमहल। ये सीट आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित है। इस सीट पर जहां मुस्लिम 34 फीसदी वोटर हैं वहीं आदिवासी समाज की 29 फीसदी ही है। मुसलमानों की ज्यादा गिनती के बावजूद इस सीट को ST के लिए आरक्षित किया गया है। 

रांची

इसी प्रकार झारखंड की ही एक और लोकसभा सीट है रांची। इस सीट पर भी आदिवासी समाज के वोटर 29 फीसदी है मगर ये सीट आरक्षित न हो कर जनरल है। इस सीट पर मुस्लिम आबादी 15.5 % है। 

3. मुस्लिम केंद्रित सीटें जो परिसीमन में आरक्षित हैं 

पूरनपुर

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिला की एक विधानसभा सीट है पूरनपुर। इस जगह को मिनी पंजाब भी कहा जाता है। इस इलाके को भाजपाई गाँधी परिवार का गढ़ माना जाता है। पूरनपुर को 2009 परिसीमन में दलित आरक्षित कर दिया है। पिछले दो विधानसभा चुनाव से यहां से भाजपा के बाबू राम पासवान चुनाव जीत रहे है। 2007 में यहां से बसपा के सिंबल पर अरशद खान चुनाव जीत चुके हैं। 

अगर मैं इस सीट के जातीय समीकरण की बात करूँ तो यहां मुस्लिम समुदाय के लगभग 67 हजार मतदाता है। दूसरे नंबर पर 42 हजार ब्राह्मण और 43 हजार लोध किसान मतदाता है। इसके अलावा 22 हजार सिख और 28 हजार बंगाली मतदाता भी अहम हैं। 

फरीदपुर

उत्तर प्रदेश के बरेली की फरीदपुर विधानसभा सीट जहां 3 लाख से ज्यादा मतदाता है और उसमें अनुमानित एक तिहाई मुस्लिम मतदाता होने के बावजूद परिसीमन में दलित आरक्षित किया गया है। यहां पर दलित आबादी केवल 16 फीसदी है।

हस्तिनापुर

मेरठ जिले की हस्तिनापुर विधानसभा के राजनीतिक समीकरण में सवा तीन लाख वोटर वाली इस विधानसभा में एक लाख मतदाता मुस्लिम हैं। गुर्जर मतदाता भी इस सीट के चुनावी गणित में अहम भूमिका में है। लगभग 60 हजार दलित मतदाता वाली हस्तिनापुर सीट को मुस्लिम केंद्रित सीट होने के बावजूद परिसीमन के नाम पर दलित आरक्षित कर दिया गया है। 

दलित समुदाय के लिए आरक्षित मेरठ जिले की हस्तिनापुर सीट से पिछले दो चुनाव से भाजपा के दिनेश खटीक चुनाव जीत रहे है। इस सीट पर 2022 के विधानसभा चुनाव में सेकुलर सपा गठबंधन ने पूर्व बसपा विधायक और दंगों के आरोपी योगेश वर्मा को उम्मीदवार बनाया था।

बलरामपुर

बलरामपुर विधानसभा में 25 फीसदी मुस्लिम मतदाता होने के बावजूद परिसीमन के नाम पर ये सीट दलित आरक्षित है। यहां पर OBC और सामान्य वर्ग के लोगों की भी एक बड़ी गिनती चुनाव में अहम भूमिका निभाती है जबकि दलित आबादी केवल 14% है।

शाहजहांपुर

शाहजहांपुर लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश की उन लोकसभा सीट में शामिल है जहां से कभी भी एक प्रत्याशी दूसरी बार लगातार चुनाव नहीं जीता है। चुनावी बिसात में अहम भूमिका वाले 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता होने के बावजूद इस सीट को 2009 में परिसीमन के नाम पर दलित आरक्षित कर दिया गया है। 

इस लोकसभा सीट पर पिछले दो चुनाव से भाजपा का कब्ज़ा है। इसके साथ ही इस लोकसभा के अंतर्गत आने वाली सभी 6 विधानसभा सीटें मौजूदा समय में भाजपा के खाते में हैं। 17 फीसदी दलित आबादी वाली इस सीट पर बसपा का अच्छा वोट शेयर होने के बावजूद भी पार्टी यहां से कभी चुनाव नहीं जीत पायी है। 

बिसौली

बदायूं जिले की बिसौली विधानसभा सीट को आप सपा का गढ़ भी कह सकते है। 2009 के परिसीमन के बाद इस सीट के चुनावी गणित बदल गए और इसको दलित आरक्षित कर दिया गया है। 

लगभग 4 लाख मतदाता वाली इस सीट पर 80 हजार मुस्लिम मतदाता जीत हार में अहम भूमिका निभाते हैं। 70 हजार यादव और 40 हजार मौर्य वोट भी चुनावी राजनीति में अहम है। इसके अलावा 90 हजार दलित वोट इस सीट पर बसपा को भी एक अच्छा चुनावी आधार प्रदान करती है। 

4. दलित केंद्रित के साथ मुस्लिम आबादी वाली दलित आरक्षित सीटें 

बाराबंकी

बाराबंकी लोकसभा सीट को समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता है मगर पिछले दो चुनाव से भाजपा यहां से चुनाव जीत रही है। एक समय में कांग्रेस के सबसे बड़े दलित चेहरा पी एल पुनिया 2009 में यहां से सांसद रह चुके हैं। 

लगभग 18 लाख मतदाता वाली सीट पर 25 फीसदी मुस्लिम मतदाता होने के बावजूद ये सीट परिसीमन के नाम पर दलित आरक्षित है। अब तक मुसलमानों का समर्थन ही किसी भी उम्मीदवार का चुनावी भाग्य तय करता रहा है। वहीं बाराबंकी सीट पर कुर्मी, पासी और यादव बिरादरी के मतदाताओं की भी अच्छी खासी तादाद है।

मोहनलालगंज

लखनऊ और उन्नाव से सटी हुयी मोहनलालगंज सीट भी दलित समुदाय के लिए आरक्षित है। इस सीट पर 35 फीसदी दलित आबादी के साथ 22 फीसदी मुस्लिम मतदाता भी चुनावी राजनीति में अहम भूमिका निभाते है। 

1998 से 2009 तक इस सीट से समाजवादी पार्टी चुनाव जीतती रही है। वहीं पिछले दो चुनाव से भाजपा के कौशल किशोर सांसद हैं। दलित केंद्रित सीट होने की वजह से बसपा का भी इस सीट पर अच्छा वोट बैंक है। पिछले तीन लोकसभा चुनाव में बसपा इस सीट पर दूसरे नंबर पर रही है। 

जबलपुर पूर्व

मध्य प्रदेश में एक विधानसभा है जबलपुर पूर्व जो दलित समुदाय के लिए आरक्षित है। इस सीट पर मुस्लिम आबादी लगभग 26 फीसदी है। चूंकि ये विधानसभा सीट आरक्षित हो गयी है तो मुस्लिम राजनीति यहां पर ख़त्म ही समझा जाये क्यूंकि मुस्लिम उम्मीदवार जीतना तो दूर चुनाव भी नहीं लड़ सकता है।

खंडवा

मध्य प्रदेश के निमाड़ रीजन की सबसे अहम विधानसभा सीट है खंडवा। इस सीट से पिछले तीन बार से भाजपा के देवेंद्र वर्मा विधायक हैं। खंडवा शहर मध्य प्रदेश के उन इलाकों में शामिल है जहां मुस्लिम आबादी अच्छी खासी तादाद में रहती है। यहां की लगभग 30 फीसदी आबादी मुस्लिम समुदाय की है। 

हैरानी की बात तो ये है कि केवल 15 फीसदी दलित आबादी वाली इस सीट को परिसीमन के नाम पर दलित आरक्षित कर के मुसलमानों को सीधे तौर पर राजनीतिक रण से बाहर कर दिया गया है। अब यहाँ से मुस्लिम व्यक्ति का चुनाव जीतना तो दूर लड़ने पर भी पाबन्दी है। 

गोपालगंज 

बिहार की गोपालगंज लोकसभा सीट जहां 17% मुस्लिम आबादी है और केवल 12% दलित आबादी है इसके बावजूद परिसीमन के नाम पर इसको दलित आरक्षित सीट किया हुआ है। वहीं दूसरी तरफ 29 फीसदी दलित मतदाता वाली सीट औरंगाबाद जनरल कैटागरी में है। इस सीट पर 12% मुस्लिम आबादी भी है।

मनिहारी

बिहार की मनिहारी विधानसभा सीट 39% मुस्लिम आबादी के बावजूद आदिवासी समाज के लिए क्यों आरक्षित है? जबकि यहां आदिवासी आबादी केवल 13% है।

धोरैया

बांका लोकसभा के अंतर्गत आने वाली धोरैया विधानसभा मुस्लिम केंद्रित होने के बावजूद परिसीमन के नाम पर दलित आरक्षित सीट है। यहां पर लगभग 18% मतदाता मुस्लिम समुदाय से हैं वहीं दलित आबादी केवल 13% है। जातीय समीकरण की बात की जाए तो यहां कुर्मी-धानुक, यादव, मुस्लिम की मतदाता चुनावी राजनीती में अहम भूमिका निभाते हैं। 

पिछले दो दशक से जेडीयू का धोरैया सुरक्षित सीट पर कब्जा बरकरार है। यह सीट पहले गोड्डा और बाद में भागलपुर संसदीय क्षेत्र का हिस्सा रही है। 2009 के परिसीमन में यह सीट बांका संसदीय क्षेत्र से जुड़ी है। इस सीट पर इससे पहले 23 साल तक सीपीआई का कब्जा रहा है। आज़ादी के बाद दो बार इस सीट से कांग्रेस के मौलाना समीनुद्दीन विधायक रह चुके हैं। 

करीमगंज 

असम की करीमगंज लोकसभा सीट जहां मुस्लिम आबादी बहुमत में 56% है और दलित आबादी केवल 12 फीसदी है मगर फिर भी ये सीट SC समुदाय के लिए आरक्षित है। 

अभयपुरी दक्षिण

असम के बंगाईगाँव जिले की एक विधानसभा है अभयपुरी दक्षिण। इस सीट पर मुस्लिम मतदाता 56% होने के बावजूद भी इसको परिसीमन के नाम पर दलित आरक्षित किया गया है जबकि यहां पर दलित आबादी केवल 13% है। 

अभयपुरी दक्षिण पर 2021 के चुनाव में कांग्रेस उम्मदीवार ने जीत दर्ज की है। वहीं 2016 के चुनाव में AIUDF ने यहां से चुनाव जीता था। क्या एक मुस्लिम बहुल इलाके को परिसीमन के नाम पर दलित आरक्षित करना मुसलमानों को खुलेआम विधायिका से दूर रखने की साजिश तो नहीं ?

भगवानपुर

उत्तराखंड की भगवानपुर विधानसभा सीट भी परिसीमन के तहत आरक्षित सीट है। करीब 1.12 लाख मतदाता वाली इस सीट पर सर्वाधिक 35% मुस्लिम मतदाता हैं। जो क्षेत्र के प्रमुख बड़े गांव सिकरौढ़ा, सिरचंदी, सिकंदरपुर भैंसवाल, खेलपुर, मोहितपुर आदि में निवास करते हैं। 26% दलित और शेष सैनी, गुर्जर, ब्राह्मण, ठाकुर, जाट, कश्यप, त्यागी आदि जाति- बिरादरी के वोटर हैं।

इस विधानसभा सीट पर पिछले दो चुनाव से कांग्रेस का कब्ज़ा है मगर इसको बसपा की मजबूत गढ़ में गिना जाता है जहाँ इनका वोट शेयर दूसरे नंबर पर रहता है। 2007 और 2012 का विधानसभा चुनाव बसपा यहाँ से जीत चुकी है। 

गुलबर्गा 

कर्नाटक की हसन लोकसभा सीट पर दलित आबादी 20% है इसके बावजूद ये सीट जनरल है मगर इसके उल्ट 23 फीसदी मुस्लिम मतदाता वाली गुलबर्गा सीट को दलित आरक्षित किया गया है। 

कच्छ 

गुजरात की कच्छ लोकसभा सीट 22 फीसदी मुस्लिम मतदाता होने के बावजूद परिसीमन के नाम पर आरक्षित सीट है। यहां दलित आबादी केवल 11 फीसदी है। जबकि इससे ज्यादा दलित आबादी वाले बनासकांठा लोकसभा सीट को जनरल कैटोगरी में रखा है। वजह साफ़ है क्यूंकि वहां मुसलमान केवल 1.7% फीसदी हैं।

कुर्ला 

महाराष्ट्र की कुर्ला विधानसभा में 31 फीसदी मुस्लिम मतदाता है। इस सीट पर केवल 13.7% दलित होने के बावजूद ये सीट परिसीमन के नाम पर आरक्षित है। 

धारावी 

महाराष्ट्र की धारावी विधानसभा भी 34% मुस्लिम मतदाता होने के बावजूद परिसीमन के नाम पर दलित आरक्षित है। यहां पर केवल 16 फीसदी दलित मतदाता हैं।

ज़हीराबाद 

तेलंगाना विधानसभा की एक सीट है ज़हीराबाद जिसको 2009 में परिसीमन के बाद दलित आरक्षित कर दिया गया है। इस सीट पर लगातार दो बार 1999 और 2004 में कांग्रेस के मोहम्मद फरीदुद्दीन चुनाव जीते है और वाई.एस.आर. रेड्डी की सरकार में 2004 में अल्पसंख्यक कल्याण और मत्स्य पालन मंत्री भी बने थे। 

इस विधानसभा के आरक्षित होने के बाद फरीदुद्दीन अम्बरपेट से चुनाव लड़े थे मगर चुनाव हार गए थे। 2014 में उन्होंने BRS को ज्वाइन किया जिसके बाद तेलंगाना विधान परिषद का सदस्य चुना गया था।

हाजीपुर और औरंगाबाद 

बहुत सारी ऐसी सीटें भी देशभर में मौजूद हैं जहां दलित आबादी कम है मगर उसे परिसीमन के नाम पर आरक्षित किया है जबकि उसके उल्ट ज्यादा आबादी वाली सीटें जनरल हैं। बिहार की हाजीपुर की लोकसभा सीट पर 20% दलित आबादी है फिर भी ये सीट आरक्षित है। इसके विपरीत औरंगाबाद बिहार की सीट पर 28.5% आबादी होने के बावजूद ये सीट जनरल कैटागरी में है। 

5. मुस्लिम केंद्रित होने के बावजूद मुस्लिम विधायका विहीन सीटें 

बाजपट्टी

सीतामढ़ी की एक विधानसभा सीट है बाजपट्टी। इस सीट के समीकरण देखेंगे तो समझ आयेगा कि इस सीट पर मुस्लिम मतदाता 31 फीसदी हैं। इसके बावजूद 1977 के चुनाव से लेकर 2020 के विधानसभा चुनाव तक कोई मुस्लिम विधायक नहीं बना है। 

राजद जो अभी मुस्लिम मतदाता की पहली पसंद है वो भी इस सीट से मुस्लिम प्रत्याशी को उम्मीद्वार बनाने में आनाकानी करती है। अभी तक हुए सभी चुनाव में से केवल 2010 के चुनाव में मुस्लिम उम्मीदवार मो. अनवारूल आलम दूसरे नंबर पर रहें हैं। इसके अलावा इस विधानसभा में मुस्लिम राजनीतिक भागीदारी का अकाल ही रहा है। 

मुसलमानों के पिछड़ेपन की बातें करना और जितनी आबादी उतनी भागीदारी का राग अलापने से केवल मुस्लिम समाज का उत्थान नहीं होगा बल्कि जब ये सेकुलर पार्टियां निष्पक्ष हो कर मुसलमानों को राजनीती में भागीदारी का उचित मौका देंगी तभी ये पिछड़ापन दूर होगा।

नरेला 

भोपाल की नरेला विधानसभा में 32% मुस्लिम मतदाता होने के बावजूद मुख्य राजनीतिक पार्टियां मुसलमान को उम्मीदवार नहीं बनाती हैं। मुस्लिम केंद्रित सीट पर भी मुस्लिम विधायक न होना अपने आप में बहुत सवाल पैदा करता है।

भायखला 

राजनीतिक हलकों में दिन रात AIMIM को बी टीम कहने वाले सेक्युलर पार्टियों के नेतागण ये बताने का कष्ट करेंगे कि महाराष्ट्र के भायखला (Byculla) विधानसभा में 42 फीसदी मुस्लिम मतदाता होने के बावजूद इनको वहां से मुस्लिम प्रत्याशी क्यों नहीं मिलता है। 

अमरावती 

अमरावती विधानसभा में 46% मुस्लिम मतदाता होने के बावजूद भी आज तक कोई मुस्लिम समुदाय से विधायक नहीं बना है। पार्टियां भी यहां से मुस्लिम व्यक्ति को उम्मीदवार बनाने में इच्छा नहीं दिखाती है। मुस्लिम बहुल सीट पर भी मुस्लिम विधायक न होना अपने आप में बहुत सवाल पैदा करता है।

भोपाल

भोपाल लोकसभा की भोपाल उत्तर, भोपाल मध्य और नरेला विधानसभा मुस्लिम बहुल है इसके बावजूद कांग्रेस को लोकसभा में मुस्लिम उम्मीदवार से घबराहट क्यों होती है?

आखिर परिसीमन में आरक्षित सीट करने का क्या पैमाना होता है जबकि उसी समाज किए बराबर आबादी के बावजूद एक मुस्लिम बहुल सीट को आरक्षित की कैटोगरी में डाला जाता है वहीं दूसरी सीट को जनरल ही रहने दिया जाता है।

आखिर क्यों न माना जाये कि परिसीमन के नाम पर आरक्षित सीट के खेल की वजह से मुस्लिम राजनीती ख़त्म होती जा रही है। आरक्षित सीट का सबसे बड़ा नुकसान तो यही है कि मुसलमान वहां चुनाव जीतना तो दूर लड़ने से भी वंचित हो जाता है।

निष्कर्ष

अब परिसीमन के नाम पर हुए इस अन्याय को देखने के बाद कुछ सवाल हर व्यक्ति के दिमाग में गर्दिश करते है जिसके जवाब शायद किसी के पास भी नहीं हैं। 

1. क्या परिसीमन के नाम पर मुस्लिम बहुल सीटों को दलित आरक्षित करना पहले से ही हाशिये पर मौजूद मुस्लिम राजनीती को ख़त्म करने की साजिश तो नहीं?

2. कांग्रेस पार्टी जो सेकुलरिज़्म की झंडा वाहक है जो अभी मुसलमानों के सबसे बड़े हितैषी होने का दावा करती है उसके राज में ही मुसलमानों के साथ राजनीतिक तौर पर इतना बड़ा अन्याय कैसे हो गया?

3. राजनीतिक तौर पर बेहद पिछड़ा मुस्लिम समुदाय राजनीतिक भागीदारी के लिए आखिर कब तक तरसता रहेगा?

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